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व्यंग्य – देवलोक में डी ग्रेड 

सब आदमियों के पाप-पुण्य कर्मो का हिसाब लिखकर चित्रगुप्त ऑफिस का काम निपटा के मजे से घर पर सोया था कि उसके पास whatsapp पर सूचना आयी । 

इंद्रसभा के बजटसत्र में किसी देवता ने कोई प्रश्न पूछ लिया था और उसका जवाब तैयार करना था । आनन फानन में यमराज ने बुलवा लिया । यमराज खुद भी सकपकाये हुए थे, बोले,” यार चित्रगुप्त, नौकरी करना आजकल कठिन हो गया । ये whatsapp भी जी का जंजाल है, ये देवता लोगों को और कोई तो काम है, कोई न कोई आदेश भेजते रहते है और चैन नही लेने देते ।”

चित्रगुप्त बोले- सही कहा सर, पहले सरल था, मेरे पास एक पोथा था उसमें सब कुछ लिख लेता था, अब तो शिक्षा विभाग की तरह कभी वैकुण्ड लोक से कोई सूचना मांगी जाती है, कभी शिवलोक वाले कोई आंकड़ा पूछ लेते है, परेशान करके रख दिया है । जो आत्माएं यमलोक में आ रही है उसमें से sc कितने, st कितने, gen कितने, obc कितने, पुरुष कितने, महिलाये कितनी, यानी b, g, t छांटो । फिर age के हिसाब से छांटो । नारद ऋषि ने कहा है कि सारी आत्माओं का डाटा यमदर्शन और यमदर्पण पर upload और करवाओ…मन तो करता है रिजाइन कर दूँ ।” 

यमराज भी भावुक हो उठे, बोले- चित्रगुप्त नौकरी तो मैं भी छोड़ दूँ पर फिर मुझे मेरे बच्चों का ख्याल आता है, क्या खायेंगे, बेरोजगारी ज्यादा है, प्राइवेट नौकरी में कुछ रखा नही वरना राहुकेतु एंड कंपनी तो मुझे नियुक्ति देने को तैयार है, खैर छोड़ो, वो यमलोक के फोटो खींचकर साइट पर डलवा देना नही तो ब्रह्मलोक से स्पष्टीकरण आएगा । और बताओ पृथ्वी लोक के क्या हाल है?

चित्रगुप्त अब थोड़े मुस्कुराए, बोले- सर जो आत्माएं ताजा ताजा पृथ्वी से आ रही है वो अपडेट दे रही है कि पृथ्वी पर योगियों का राज हो गया है । नोटबन्दी के बाद काला धन तो खत्म हो ही गया था already, इसलिये सब कुशल मंगल है पृथ्वीलोक पर लेकिन स्वर्ग लोक में हड़कम्प मचा हुआ है ।

यमराज थोड़े टेंशन में आये- क्यों चित्रगुप्त? ऐसा क्या हुआ?

चित्रगुप्त ने यमलोक का पंखा थोड़ा तेज किया और बोले- “सर आपको तो पता ही है, स्वर्ग लोक में ग्रेडिंग सिस्टम लग गया है।

शिवपुत्र बाल गणेशा कि तो A ग्रेड आयी है लेकिन इंद्र के पुत्र जयंत और चंद्रदेव के पुत्र बुध, सूर्यपुत्र शनि आदि सभी बालकों की D ग्रेड आयी है । result खराब होने के कारण गुरु बृहस्पति के नाम नोटिस निकला है ।”

यमराज बोले – इस समस्या का क्या हल है चित्रगुप्त? 

चित्रगुप्त बोले-धर्मराज सर, रिटायरमेंट से पहले ही पृथ्वीलोक पर अभी 2 मास्टरों का देहांत हुआ है । उनकी आत्माओं को बुलाया है, दोनों हेडमास्टर थे लेकिन रिसल्ट 100% दिया हमेशा, मैंने दोनों को स्वर्ग के सरकारी स्कूल में कुछ दिन डेपुटेशन लगवाया था, अभी दोनों आते होंगे । 

The Academic Partner Bali
तभी पायजामा कुर्ते और गमछे चश्मे में दुबले पतले दो लोग आ पहुँचे । उनकी पूरी जिंदगी डाके बनाने में गुजरी थी, कार्बन कॉपी में हेडमास्टर की सील लगाकर तथ्यात्मक रिपोर्ट बनाकर लाये थे । 

उनमे से एक हेडमास्टर बोला- यहाँ भी वहीँ हाल है जो पृथ्वी लोक पर है । साल के बारह महीने दिन के चौबीस घण्टे पढाई से अलग वाले ही काम है, । यहाँ अग्नि देव पोषाहार प्रभारी है क्योंकि खाना उन्ही पर बनता है । वरुण देव स्वच्छता प्रभारी है, पानी की जरूरत पड़ती है, बृहस्पति जी हेडमास्टर की तरह डाके बनाने में बिजी रहते है, वायुदेव बीएलओ की तरह पूरे सातों लोकों में घुमते रहते है, कुबेर के पास कैशबुक का चार्ज है और वो लेनदेन में बिजी रहते है और बैंक के चक्कर काटते डोलते है । देवी सरस्वती पुस्तकालय प्रभारी है । चंद्रदेव मेहनती अध्यापक है लेकिन उनको प्रशिक्षणों में बुलवा लेते है तो वो महीने में 15 दिन दिखते नही…..”

यमराज और चित्रगुप्त दोनों एक साथ बोले- लेकिन पृथ्वी लोक पर तो तुम दोनों की तो हमेशा c ग्रेड आयी है । इतने कामों के बावजूद तो यहाँ भी वहीँ आईडिया बताओ न …

एक हेडमास्टर बोले- ,”अब यहाँ भी किसी की डी ग्रेड नही आएगी, हमने एक whatsapp ग्रुप बनाया है जिसका नाम है, “नोडल केंद्र देवलोक” उसमें सारे देव टीचर add कर लिए है और मैसेज वायरल कर दिया है कि तुम लोगों को पढ़ाने को तो मिलना नही । स्पष्टीकरण/नोटिस से बचना है तो ठीक ठीक नम्बर देना अपने अपने विषय में । ”

(अबकी बार किसी की डी नही आयी और ब्रह्मा विष्णु महेश भी सोच में पड़ गए है )

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Busy but Be Easy Too

एक गिलहरी रोज अपने काम पर समय से आती थी और अपना काम पूरी मेहनत और ईमानदारी से करती थी !

गिलहरी जरुरत से ज्यादा काम कर के भी खूब खुश थी क्योंकि उसके मालिक, जंगल के राजा शेर ने उसे दस बोरी अखरोट देने का वादा कर रखा था।

गिलहरी काम करते करते थक जाती थी तो सोचती थी कि थोडी आराम कर लूँ
वैसे ही उसे याद आता,
कि शेर उसे दस बोरी अखरोट देगा –
गिलहरी फिर काम पर लग जाती !

गिलहरी जब दूसरे गिलहरीयों को खेलते देखती थी तो उसकी भी इच्छा होती थी कि मैं भी खेलूं पर उसे अखरोट याद आ जाता,
और वो फिर काम पर लग जाती !

ऐसा नहीं कि शेर उसे अखरोट नहीं देना चाहता था, शेर बहुत ईमानदार था !

ऐसे ही समय बीतता रहा….

एक दिन ऐसा भी आया जब जंगल के राजा शेर ने गिलहरी को दस बोरी अखरोट दे कर आज़ाद कर दिया !

गिलहरी अखरोट के पास बैठ कर सोचने लगी कि अब अखरोट मेरे किस काम के ?
पूरी जिन्दगी काम करते – करते दाँत तो घिस गये, इन्हें खाऊँगी कैसे !

यह कहानी आज जीवन की हकीकत बन चुकी है !

इन्सान अपनी इच्छाओं का त्याग करता है, पूरी ज़िन्दगी नौकरी, व्योपार, और धन कमाने में बिता देता है !
६० वर्ष की ऊम्र में जब वो सेवा निवृत्त होता है, तो उसे उसका जो फन्ड मिलता है, या बैंक बैलेंस होता है, तो उसे भोगने की क्षमता खो चुका होता है, तब तक जनरेशन बदल चुकी होती है, परिवार को चलाने वाले बच्चे आ जाते है।

क्या इन बच्चों को इस बात का अन्दाजा लग पायेगा की इस फन्ड, इस बैंक बैलेंस के लिये : –

कितनी इच्छायें मरी होंगी ?
कितनी तकलीफें मिली होंगी ?
कितनें सपनें अधूरे रहे होंगे ?

क्या फायदा ऐसे फन्ड का, बैंक बैलेंस का, जिसे पाने के लिये पूरी ज़िन्दगी लग जाये और मानव उसका भोग खुद न कर सके !

इस धरती पर कोई ऐसा अमीर अभी तक पैदा नहीं हुआ जो बीते हुए समय को खरीद सके।

इसलिए हर पल को खुश होकर जियो व्यस्त रहो, पर साथ में मस्त रहो सदा स्वस्थ रहो।

BUSY पर BE-EASY भी रहो ।

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प्रमुख रचनाकार एवम् उनके उपनाम

प्रमुख उपनाम

1 वाल्मीक़ि – आदिकवि

2 स्वयंभू – अपभ्रंश का वाल्मीकि

3 सैयद इब्राहिम – रसखान

4 तुलसीदास – मानस का हंस / लोकनायक

5 केशवदास – कठिन काव्य का प्रेत

6 घनानंद – प्रेम की पीर का कवि

7 सदासुख लाल – नियाज़

8 बद्रीनारायण – प्रेमघन

9 भारतेन्दू – हिंदी नवजागरण का अग्रदूत

10 महादेवी वर्मा – आधुनिक युग की मीरा

11 पन्त – प्रकृति का सुकुमार कवि

12 माखन लाल -एक भारतीय आत्मा

13 गया प्रसाद शुक्ल – स्नेही/ त्रिशूल/तरंगी/अलमस्त

14 राजा शिवप्रसाद – सितारे हिन्द

15 सूर्यकान्त त्रिपाठी – निराला / महाप्राण

The Anonymous Classes, Bali

16 गोपाल शरण- नेपाली

17 हरिवंश राय – हालावादी/निराशावादी

18 सच्चिदानंद – अज्ञेय/ कठिन गद्य का प्रेत

19 उपेन्द्रनाथ – अश्क

20 पाण्डेय बेचन- उग्र

21 भवानी प्रसाद – कविता का गांधी

22 सियारामशरण – हिंदी साहित्य का बापू

23 प्रेमचन्द – कहानी सम्राट/ जीवनी कलम का सिपाही/ कलम का मजदूर / भारत का मेक्सिगोर्क

24 विद्यापति – मैथिल कोकिल/अभिनव जयदेव/कवि शेखर/ सरस कवि/ खेलन कवि/ कवि रंजन

25 सूरदास – पुष्टि मार्ग का जहाज/ अष्टछाप का जहाज/ वात्सल्य रस का सम्राट/ खंजन नयन

Career Aim Aim Career

26 जगन्नाथ दास – रत्नाकर और “जकी ” उपनाम से उर्दू में लिखते थे!!

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एक शिक्षक की कलम से

प्रिय 
      माता-पिता,

परीक्षाऔ का दौर लगभग समाप्ति की ओर  है।

अब आप अपने बच्चों के
रिजल्ट को लेकर
चिंतित हो रहे होंगे ।

लेकिन कृपया याद रखें, 
वे सभी छात्र
जो परीक्षा में शामिल हो रहे हैं, 
इनके ही बीच में

कई कलाकार भी हैं, 
जिन्हें गणित में पारंगत होना 
जरूरी नहीं है।

इनमें अनेकों उद्यमी भी हैं,
जिन्हें इतिहास या 
अंग्रेजी साहित्य में 
कुछ कठिनाई 
महसूस होती होगी, 
लेकिन ये ही आगे चलकर 
इतिहास बदल देंगे I

इनमें संगीतकार भी हैं
जिनके लिये
रसायनशास्त्र के अंक 
कोई मायने नहीं रखते ।

इनमें खिलाड़ी भी हैं,
जिनकी फिजिकल फिटनेस
फिजिक्स के अंकों से ज्यादा
महत्वपूर्ण हैं ।

यदि आपका बच्चा 
मैरिट अंक प्राप्त करता है
तो ये बहुत अच्छी बात है।

लेकिन यदि वह 
ऐसा नहीं कर पाता तो 
उससे कृपया
उसका आत्मविश्वास न छीनें |

उसें बतायें कि 
सब कुछ ठीक है 
और ये सिर्फ परीक्षा ही है ।

वह जीवन में 
इससे कहीं ज्यादा 
बड़ी चीजों को 
करने के लिये बना है |

इस बात से 
कोई फर्क नहीं पड़ता कि 
उसने कितना स्कोर किया है।

उसे प्यार दें 
और उसके बारे में 
अपना फैसला न सुनायें ।

यदि आप उसे 
खुशमिज़ाज़ बनाते हैं 
तो वो कुछ भी बने 
उसका जीवन सफल है,

यदि वह
खुशमिज़ाज़ नहीं है
तो वो कुछ भी बन जाए, 
सफल कतई नहीं है ।

कृपया ऐसा करके देखें, 
आप देखेंगे कि आपका बच्चा
दुनिया जीतने में सक्षम है।

एक परीक्षा या
एक 90% की मार्कशीट
आपके बच्चे के 
सपनों का पैमाना नहीं है ।

✍ एक अध्यापक

इसको ज्यादा से ज्यादा 
शेयर करे
ताकि कोई बच्चा आत्महत्या
जैसी सोच से भी दूर रहे ।

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बिल : एक कहानी

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सच्ची घटना …!!
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रात का वक्त था, होटल के टेबल पर बैठा एक समान्य वयस्क मजदूर अपना खाना खा रहा था ..! तभी उसकी नजर होटल के बाहर कडी ठण्ड में खडे छोटे से भाई बहन की जोडी पर गई …!!
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उन दोनों बच्चों की दुखी नजर उस आदमी के टेबल पर रखी खाने की थाली पर थी, यह बात उस आदमी के ध्यान में सेकंड में आ गयी …!!
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नजरों से इशारा करते दोनों बच्चों को अंदर बुलाया बच्चे डरते डरते ही अंदर आये,
उस आदमी ने दोनों बच्चों के लिए खाने की दो थाली मंगाई …..
नन्हे बच्चें अपने नन्हे से हाथों में जो बैठ रहा था वो फटाफट खा रहे थे ……
नन्हे बच्चों के पेट में भूख की आग बुझ रही थी …
खाना खाने के बाद उस आदमी ने बिल मंगवाया …..!!
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काउंटर पर से बिल आया, आँकड़ा देखकर वो आदमी स्तब्ध निशब्द रह गया ..!!
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पता है, बिल कितना था ?
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उस बिल पर लिखा था “हमारे पास ऐसी कोई मशीन या आँकडा नहीं जिससे मानवता की कीमत लगाई जा सके, भगवान आपका भला करे ”

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रीतिकाल

रीतिकाल (1658-1857 ई.) हिन्दी साहित्य का उत्तर मध्यकाल कहलाता है। इस काल के काव्य की प्रमुख धारा का विकास कविता की रीति के आधार पर हुआ। रीतिकाल समृद्धि और विलासिता का काल है। साधना के काल भक्तियुग से यह इसी बात में भिन्नता रखता है कि इसमें कोरी विलासिता ही उपास्य बन गयी, वैराग्यपूर्ण साधना का समादर न रहा। सजाव-शृंगार की एक अदम्य लिप्सा इस युग के साहित्य में प्रतिबिम्बित होती है। रीति-काव्य के विकास में तत्कालीन राजनीतिक तथा सामाजिक परिस्थितियों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। वस्तुत: ये परिस्थितियाँ इस प्रकार के काव्य सर्जन के अनुकूल थीं। हिन्दी के रीतिशास्त्र का आधार पूर्ण रूप से संस्कृत काव्यशास्त्र है। परन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं है कि हिन्दी में रीतिशास्त्र लिखने वाले प्रत्येक लेखक ने संस्कृत काव्यशास्त्र का पूरा अध्ययन किया था या किसी अन्य ग्रन्थ को पूर्णत: हिन्दी में उतारा था।

रीति शब्द की व्याख्या
‘रीति’ शब्द संस्कृत के काव्यशास्त्रीय ‘रीति’ शब्द से भिन्न अर्थ रखने वाला है। संस्कृत साहित्य में रीति को ‘काव्य की आत्मा’ मानने वाला एक सिद्धान्त है, जिसका प्रतिपादन आचार्य वामन ने अपने ग्रन्थ ‘काव्यालंकारसूत्र’ में किया था- ‘रीतिरात्मा काव्यस्य’। रीति काव्य की आत्मा है और काव्य की श्रेष्ठता की कसौटी रीति है, यह मान्यता इस सिद्धान्त की है। वैदर्भी, पांचाली, गौड़ी, लाटी रीतियाँ हैं। रीति का आधार गुण है। संस्कृत की रीति सम्बन्धी यह धारणा हिन्दी काव्यशास्त्र के कुछ ही ग्रन्थों में ग्रहण की गयी है। परन्तु रीति की काव्य रचना की प्रणाली के रूप में ग्रहण करने की अपेक्षा प्रणाली के अनुसार काव्य रचना करना, रीति का अर्थ मान्य हुआ। इस प्रकार रीतिकाल का अर्थ हुआ- “ऐसा काव्य जो अलंकार, रस, गुण, ध्वनि, नायिका भेद आदि की काव्यशास्त्रीय प्रणालियों के आधार पर रचा गया हो।” इनके लक्षणों के साथ या स्वतंत्र रूप से इनके आधार पर काव्य लिखने की पद्धति ही रीति नाम से विख्यात हुई और यह पद्धति जिस काल में सर्वप्रधान रही, वह काल ‘रीतिकाल’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

नामकरण

रीतिकाल 1700 से 1900 तक का काल है। मोटे तौर पर मुग़ल बादशाह शाहजहाँ के शासन की समाप्ति और औरंगज़ेब के शासन के प्रारम्भ (1658 ई.) से लेकर प्रथम स्वाधीनता संग्राम (1857 ई.) तक यह काल माना जाता है। इस युग में भक्तिकालीन काव्यधाराओं, जैसे सन्तकाव्य, प्रेमाख्यानकाव्य, रामभक्तिकाव्य, कृष्णभक्तिकाव्य, वीरकाव्य, नीतिकाव्य आदि का विकास हुआ। परन्तु सबसे अधिक महत्त्व उसी रीतिकाव्य को प्राप्त हुआ, जो अलंकारों, रसों, नायिका-भेदों, शब्द-शक्तियों, ध्वनि-भेदों आदि के आधार पर लिखा गया। यह प्रतृत्ति इस युग की नवीन चेतना के रूप में जाग्रत हुई। इस कारण इसी के आधार पर यह नामकरण हुआ।

समृद्धि और विलासिता का काल

रीतिकाल समृद्धि और विलासिता का काल है। साधना के काल भक्तियुग से यह इसी बात में भिन्नता रखता है कि इसमें कोरी विलासिता ही उपास्य बन गयी, वैराग्यपूर्ण साधना का समादर न रहा। नवाब, जागीरदार, मनसबदार, सामन्त-सभी का उद्देश्य विलासिता और समृद्धि का जीवन था। इस समृद्धि के जीवन के लिए साधन किसी भी प्रकार के क्यों न हों, समृद्धि का अर्जन ही सामर्थ्य की सार्थकता थी। ये उच्च वर्ग के लोग कला और कविता के संरक्षक थे। कुछ तो स्वयं कवि एवं कलाकार थे। इस प्रकार इस काव्य में ऐहिक जीवन के सुख-भोग पर बल दिया गया। यह जीवन की क्षणभंगुरता को भुलाकर नहीं, वरन इसलिए कि इस क्षणभंगुर जीवन में जितने ही दिन सुख-भोग के बीत सकें, उतना ही अच्छा।

शृंगारिक साहित्य

सजाव-शृंगार की एक अदम्य लिप्सा इस युग के साहित्य में प्रतिबिम्बित है। उपासना के लिए जिन राम और कृष्ण का चरित्र भक्तिकाल में अत्युत्कृष्ट रूप में चित्रित हुआ, उनमें भी शृंगारिकता का आरोप कर शृंगारिक स्वरूप के उद्धाटन में प्रतिभा को लगाया गया। लोकैषणा का सीमित और भोग्य रूप इस काल के यथार्थवादी धरातल का संकेत करता है। पर यह यथार्थवाद सामाजिक क्रान्ति के बीज बोने वाले आधुनिक यथार्थवाद से भिन्न था। वह कला और कारीगरी का यथार्थ है, चिन्तना, ठेस, असन्तोष की चिनगारी बिखेरने वाला यथार्थ नहीं। इस काल की कलात्मक उपलब्धियों में एकरसता है, विविधता नहीं।

रचनाएँ
हिन्दी रीतिकाल के अन्तर्गत सामान्यत: दो प्रकार की रचनाएँ मिलती हैं-

एक तो वे रचनाएँ, जिनमें मुख्यत: काव्यशास्त्र सिद्धान्तों को छन्दोबद्ध किया गया है। स्पष्टत: हिन्दी कवियों का यह प्रयास बहुत महत्त्वपूर्ण नहीं हो सका है। सिद्धान्त प्रतिपादन की दृष्टि से इनका अधिक महत्त्व इस कारण नहीं है कि उनमें मौलिकता का अंश बहुत कम है। इस प्रकार के रीतिग्रन्थ अधिकतर संस्कृत लक्षण ग्रन्थों के अनुवाद हैं या फिर उनकी छाया पर आधारित है। काव्य-रस की दृष्टि से इनका स्तर ऊँचा नहीं है, क्योंकि इन आचार्य कवियों का मुख्य ध्येय काव्य लक्षणों को वर्णित करना था, स्वतंत्र रूप से अनुभूतिपरक काव्य-सर्जन करना नहीं। फिर भी यह अवश्य है कि इन कवियों के उदाहरणों में से कुछ अंश शुद्ध काव्य के अन्तर्गत रखे जा सकते हैं।
दूसरे वर्ग के अन्तर्गत वे रचनाएँ आती हैं, जो काव्य लक्षणों को प्रतिपादित करने की दृष्टि से नहीं लिखी गयीं। इस प्रकार के काव्य में भाषा, भाव तथा शैली-सभी का अत्यन्त निखरा हुआ रूप मिलता है। यह लक्षण मुक्त कविता ही वास्तव में रीतिकाल का प्राणतत्त्व है।
साहित्य का विकास

हिन्दी में रीति साहित्य के विकास के अनेक कारण हैं। एक कारण तो संस्कृत में इसकी विशाल परम्परा है। जिस समय भाषा-साहित्य का प्रारम्भ हुआ, उस समय भी संस्कृत में लक्षण या अलंकार-साहित्य की रचना चल रही थी। दूसरा कारण भाषा-कवियों को प्राप्त राज्याश्रय है। अकबर ने सबसे पहले हिन्दी कवियों को दरबार में आश्रय प्रदान किया और इस प्रकार हिन्दी काव्य को प्रोत्साहन मिला। आगे चलकर अन्य राजाओं ने भी इस प्रवृत्ति का अनुसरण किया। राजपूताना तथा मध्यभारत की रियासतों, ओरछा, नागपुर आदि में भाषा-कवियों को राज्याश्रय प्राप्त हुआ और आगे इन्हें हिन्दू और मुसलमान, दोनों के ही दरबार में प्रतिष्ठा मिली। इसके फलस्वरूप व्यापक रीति-साहित्य की रचना हुई। हिन्दी रीति-साहित्य के विकास का तीसरा कारण भी सामने आता है, जो है कवि और काव्य के स्वतंत्र रूप की प्रतिष्ठा। इस क्षेत्र में केशवदास का कार्य अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है और इसी कारण उनको आगे के युग में दीर्घ काल तक इतना सम्मान प्राप्त हुआ।

रीति-काव्य के विकास में तत्कालीन राजनीतिक तथा सामाजिक परिस्थितियों का महत्त्वपूर्ण योग रहा है। वस्तुत: ये परिस्थितियाँ इस प्रकार के काव्य सर्जन के अनुकूल थीं। इस समय की राजनीतिक उथल-पुथल और सत्ता एवं वैभव की क्षणभंगुरता ने जीवन के दो अतिरेकपूर्ण दृष्टिकोण विकसित करने में सहायता दी। एक ने जीवन के प्रति पूर्ण विरक्ति और त्याग का भाव जागरित किया, जबकि दूसरे ने पूर्ण भोग का दृष्टिकोण। ऐहिक काव्य को इस प्रकार का विलासपूर्ण चित्रण करने की प्रेरणा देने में राजनीतिक स्थिति का भी हाथ था।

सामंतवादी समाज
जहाँ तक सामाजिक पक्ष का सम्बन्ध है, मध्ययुग का समाज सामन्तवादी पद्धति पर आधारित था, जिसमें सम्राट शीर्ष पर था, जिसके बाद उसके अन्तर्गत राजा, अधिकारी और सामन्त थे, जिन्हें समाज में विशेष अधिकार और सम्मान प्राप्त थे। कवियों को अपने इन आश्रयदाताओं की रुचि के अनुसार या उन्हें प्रभावित करने वाला काव्य लिखना आवश्यक था, जिससे उनकी ऐहिक सन्तुष्टि होती थी और प्रतिभा का भी कम से कम एक क्षेत्र में विकास होता रहता था। मध्य काल के अमीर और सामन्त अत्यन्त विलासपूर्ण जीवन व्यतीत करते थे। एक राजा, अमीर अथवा सामन्त के यहाँ दो, तीन, चार या इससे भी अधिक रानियाँ रहती थीं, जिनका काम अपने को अलंकृत करके पति को रिझाना और उसके प्रसन्न होने पर विलास-सामग्री की और वृद्धि करते रहने के अतिरिक्त और कुछ नहीं था। नारी उनके हाथों में भोग-विलास का एक उपकरण मात्र बनकर रह गयी थी। मुग़लकालीन भारतीय समाज के जीवन का एक पक्ष रीतिकाव्य के सौन्दर्य और विलासपूर्ण चित्रण को प्रेरणा देने वाला था। परन्तु इसका दूसरा पक्ष जन साधारण का है। नैतिकता की दृष्टि से जन साधारण का चरित्र इन विलासी दरबारियों की अपेक्षा कहीं अच्छा था, उस पर भक्तिकाल का प्रभाव था।

हिन्दी काव्य पर प्रभाव
मध्ययुगीन मुग़ल शासन के परिणामस्वरूप कई बातें जीवन में परिव्याप्त हुई दिखती हैं-

प्रथम तो एक केन्द्रीय सुदृढ़ शासक होने से देश के भीतर तुलनात्मक दृष्टि से शान्ति का वायुमण्डल बन गया।
द्वितीय इस शान्ति के अवसर पर जीवन में कला और संस्कृति को विशेष महत्त्व प्राप्त हुआ। शिष्ट और सुसंस्कृत व्यवहार का सम्मान बढ़ा।
तीसरी बात यह है कि इसी शान्ति और समृद्ध के परिणामस्वरूप कला-प्रेम और विलासिता की भावना भी प्रखरता से जाग्रत हुई। जीवन में धर्म को, चाहे वह संकीर्ण अर्थ में ही क्यों न हो, प्रमुख स्थान मिला।
चौथी बात यह है कि भाषा-साहित्य को राजाओं और सामन्तों से संरक्षण और आश्रय मिला।
इन सभी बातों का रीतिकालीन हिन्दी काव्य पर प्रभाव परिलक्षित होता है।

मत

रीतिकालीन काव्य के सम्बन्ध में सामान्यत: दो प्रकार के मत हैं-

एक उसे नितान्त हेय और पतनोन्मुख काव्य कहकर उसके प्रति घृणा और द्वेष का भाव जगाता है।
दूसरा उस पर अत्यधिक रीझकर केवल उसे ही काव्य मानता है और अन्य रचनाओं, जैसे भक्ति और आधुनिक काल की कृतियों को उत्तम काव्य में परिगणित नहीं करता।
रीतिकालीन काव्य पर दोष
रीतिकालीन काव्य पर जो दोष लगाये जाते हैं, वे ये हैं-

अश्लीलता

रीतिकालीन समस्त काव्य को दृष्टि में रखकर जब इन दोषों पर विचार करते हैं तो यह कह सकते हैं कि ये समस्त दोष उस युग के काव्य या समस्त रीतिकाव्य पर लागू नहीं किये जा सकते। साथ ही इन दोषों में से अधिकांश प्रत्येक युग के काव्य में किसी न किसी अंश में पाये जाते हैं। जहाँ तक अश्लीलता का प्रश्न है, तो यह भावना वस्तुत: युग सापेक्ष है। एक ही प्रकार का वस्तु रूप एक युग में अथवा एक स्थिति या अवस्था में अश्लील होता है और दूसरे में नहीं। कालिदास तथा अन्य संस्कृत कवियों की रचनाओं में शरीर के कुछ अवयवों का काव्य में वर्णन और उल्लेख उन दिनों अश्लील नहीं समझा जाता था। आज वह अश्लील समझा जाता है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि अश्लील सापेक्ष पद है। जिन शब्दों (जैसे नीवी, नितम्ब, उरोज आदि) और जिन वर्णनों को आज अश्लील कहते हैं, उन सबकी परम्परा संस्कृत काव्य में गहराई के साथ रही है और बहुत कुछ वहाँ से उस शब्दावली का प्रवेश हिन्दी साहित्य में हुआ है।

समाज को प्रगति प्रदान करने की अक्षमता

दूसरा दोष प्राय: यह लगाया जाता है कि यह काव्य समाज को प्रगति प्रदान करने में समर्थ नहीं है। रीतिकाव्य और कुछ प्रबन्ध काव्यों में भी हमें व्यापक जीवन-दर्शन नहीं मिलता, इसमें कोई सन्देह नहीं। रीतिकाव्य वास्तव में यौवन का मादक, विलासपूर्ण काव्य है। फिर भी उसमें ऐसी उक्तियाँ तथा स्थितियाँ मिलती हैं, जो जीवन का अनुभव और कभी-कभी आदर्श बताती है। अत: आधुनिक दृष्टि से सामाजिक प्रगति को प्रेरणा प्रदान न करते हुए भी, इसमें जीवनोपयोगी तथ्यों का अभाव नहीं है।

आश्रयदाता की प्रशंसा

आश्रयदाता की प्रशंसा में उठी हुई काव्य-स्फूर्ति का सामाजिक तो नहीं, परन्तु ऐतिहासिक महत्त्व अवश्य है। आश्रयदाता की प्रशंसा, कला और काव्य के संरक्षण और आश्रय के कारण भी थी और इसके लिए उनकी उदार भावना सराहनीय है। ये राज्याश्रय, जिनमें रीतिकालीन कलाकृतियों का विकास हुआ, कवि-प्रतिभा को प्रोत्साहित कर सके, साथ ही साथ दूर-दूर से प्रति-भावों को अपने गुणों और कला-प्रेम के कारण खींच सके। अत: मध्ययुगीन राज्याश्रय ने कला, काव्य के संरक्षण और प्रेरणा के लिए महत्त्वपूर्ण कार्य किया है, यह मानना पड़ेगा।

साहित्य के पक्ष
जैसा कि कहा गया है, रीतिकाल के अन्तर्गत विकसित होने वाले रीति-साहित्य के दो पक्ष हैं-शास्त्रीय और शास्त्रनिरपेक्ष। इन दोनों ही पक्षों के प्रति दृष्टिकोणों में अन्तर है। लगभग एक-सी परिस्थितियों में और कहीं-कहीं तो एक ही कवि द्वारा लिखे जाने पर भी इन दोनों प्रकार की काव्य प्रवृत्तियों में अन्तर, उनके कवियों के दृष्टिकोण के कारण है। पहले वर्ग के कवि अपनी प्रवृत्ति में आचार्य अधिक थे। रीतिग्रन्थ उन्होंने या तो अपनी प्रेरणा से या अधिकांशत: अपने आश्रयदाता की इच्छा से लिखे थे। दूसरे वर्ग के कवि आचार्य रहे हों या न रहे हों, कवि वे अवश्य ही थे।

लेखन परम्परा

रीतिशास्त्र या रीतिकाव्य लिखने की परम्परा हिन्दी को संस्कृत से प्राप्त हुई। संस्कृत साहित्यशास्त्र के पाँच काव्यसिद्धान्तों में से प्राय: सभी का कुछ न कुछ प्रभाव हिन्दी रीतिशास्त्र पर पड़ा है। परन्तु जहाँ तक शास्त्रीय विवेचन का प्रश्न है, वह रीति और वक्रोक्ति-सिद्धान्तों के आधार पर अधिक नहीं लिखा गया। अलंकार, रस और ध्वनि के ही लक्षण और उदाहरण देने का सामान्यत: प्रयत्न देखने को मिलता है। इन सिद्धान्तों का भी विवेचनात्मक निरूपण कम हुआ है। इसके कई कारण हैं। पहला कारण तो यह है कि हिन्दी में रीतिशास्त्र लिखने वाले कवियों के पूर्ववर्ती तथा समकालीन संस्कृत के ऐसे विद्वान आचार्य थे, जिन्होंने काव्यशास्त्र के एक या अधिक अंगों को लेकर उनकी बड़ी ही विस्तृत और स्पष्ट व्याख्या की थी। ऐसी दशा में हिन्दी कवियों के लिए कुछ भी मौलिक कार्य करना कठिन था। फिर हिन्दी में लिखने वाले सभी काव्यशास्त्री संस्कृत साहित्य के पूर्ण विद्वान नहीं थे। इसके अतिरिक्त जिन लोगों के लिए ये ग्रन्थ निर्मित किये जा रहे थे- अर्थात् कवियों के आश्रयदातागण और सामान्य जनता-वे स्वयं इस प्रकार के विवेचन में रुचि नहीं रखते थे। वे मुख्यत: अपने मनोरंजनार्थ हिन्दी काव्य चाहते थे।

संस्कृत काव्यशास्त्र
हिन्दी के रीतिशास्त्र का आधार पूर्ण रूप से संस्कृत काव्यशास्त्र है। परन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं है कि हिन्दी में रीतिशास्त्र लिखने वाले प्रत्येक लेखक ने संस्कृत काव्यशास्त्र का पूरा अध्ययन किया था या किसी अन्य ग्रन्थ को पूर्णत: हिन्दी में उतारा था। प्राय: अपनी योजना के अनुकूल हिन्दी रीतिशास्त्र के लेखक ने अपने आधारभूत ग्रन्थ का पठित या श्रुत ज्ञान प्राप्त किया था। इस कार्य के लिए जिन संस्कृत ग्रन्थों का अधिकांश आधार लिया गया है, वे हैं-

भरत का ‘नाट्यशास्त्र’
भामह का ‘काव्यालंकार’
दण्डी का ‘काव्यादर्श’
उद्भट का ‘अलंकारसारसंग्रह’
केशव मिश्र का ‘अलंकारशेखर’
अमरदेव का ‘काव्यकल्पलताकृति’
जयदेव का ‘चन्द्रालोक’
अप्पय दीक्षित का ‘कुवलयानन्द’
भानुदत्त के ‘रसमंजरी’, ‘रसतरंगिणी’
विश्वनाथ का ‘साहित्यदर्पण’
केशवदास का योगदान

हिन्दी के पूर्ववर्ती अपभ्रंश साहित्य में रीतिशास्त्र की परम्परा नहीं रही। इसको प्रेरणा देने वाला संस्कृत साहित्य ही है और इस परम्परा को हिन्दी में डालने वाले प्रमुख व्यक्ति आचार्य केशवदास (1550 से 1610 ई.) हैं। केशव के पूर्व भी कुछ ग्रन्थ लिखे गये हैं, जिन्हें ‘रीतिशास्त्र के ग्रन्थ’ कह सकते हैं, परन्तु वे विशिष्ट रचनाएँ-सी ही है, प्रेरक प्रयास के रूप में उन्हें ग्रहण नहीं कर सकते। ‘शिवसिंहसरोज’ के आधार पर जिस ग्रन्थ का उल्लेख साहित्य के इतिहासकार सर्वप्रथम करते हैं, वह पुण्ड या पुष्य कवि है, जिसने 713 ई. के लगभग हिन्दी भाषा में संस्कृत के किसी अलंकारग्रन्थ का अनुवाद किया था, परन्तु वह ग्रन्थ अभी तक किसी के देखने में नहीं आया। यदि वास्तव में उस समय का कोई इस प्रकार का लिखा ग्रन्थ मिल जाता है, तो वह न केवल रीतिशास्त्र का, वरन् हिन्दी का पहला ग्रन्थ ठहरता है। परन्तु अभी तक इस सम्बन्ध की कोई प्रामाणिक सूचना प्राप्त नहीं हो सकी है।

ऐसी अवस्था में रीतिशास्त्र पर प्राप्त सबसे पहला ग्रन्थ कृपाराम का ‘हिततरंगिणी’ ही है। इसकी रचना सन 1541 ई. में हुई। यह पाँच तरंगों में विभक्त है और प्राय: भरत के ‘नाट्यशास्त्र’ के आधार पर है। इसके पश्चात् 1551 ई. का लिखा मोहनलाल मिश्र का ‘शृंगारसागर’ ग्रन्थ रस और नायिका-भेद का विवरण प्रस्तुत करता है तथा ‘अष्टछाप’ के प्रसिद्ध कवि नन्ददास का लिखा ‘रसमंजरी’ ग्रन्थ भी इसी समय के आस-पास का है। करनेस बन्दीजन के ग्रन्थ भी केशव के पूर्ववर्ती ग्रन्थों में ही रखे जा सकते हैं। परन्तु इन आचार्यों और ग्रन्थों में कोई भी विशेष महत्त्वपूर्ण प्रभाव रखने वाला नहीं है। अत: कह सकते हैं कि रीतिशास्त्रीय परम्परा डालने वाले पहले आचार्य केशवदास ही हैं।

रस तथा अलंकार का प्रयोग
केशवदास तथा उनके पूर्ववर्ती कवियों का काव्य, प्रवृत्ति की दृष्टि से तो रीतिकाल में आता है, परन्तु कालक्रम की दृष्टि से नहीं। काल विभाजन की दृष्टि से केशव (1550 से 1610 तक), सुन्दर तथा चिन्तामणि (रचनाकाल 1643 ई. के लगभग प्रारम्भ होता है) का स्थान भक्तिकाल के ही अन्तर्गत है। केशवदास के ग्रन्थों में ‘कविप्रिया’, और ‘रसिकप्रिया’ हैं। प्रबन्ध रचना की पद्धति पर लिखा गया ‘रामचन्द्रिका’ हिन्दी महाकाव्यों की पंक्ति में समादृत है। केशव मूलत: अलंकार सम्प्रदाय के अनुयायी थे। रस सम्प्रदाय के अन्तर्गत सुन्दर तथा चिन्तामणि पूर्व-रीतिकालीन प्रसिद्ध कवि हैं। चिन्तामणि त्रिपाठी की गणना हिन्दी रीतिशास्त्र के उत्कृष्ट और बड़े आचार्यों में है। इनके प्राप्त ग्रन्थों में से ‘पिंगलशृंगारमंजरी’, ‘कविकुलकल्पतरु’ का विशेष महत्त्व है। रीतिकाल के अन्तर्गत जिन कवियों की गणना की जाती है, वे प्रमुखत: संस्कृत के अलंकार, रस तथा ध्वनि सम्प्रदायों के अनुयायी थे। रीति और वक्रोक्ति सिद्धान्त के आधार पर हिन्दी में कुछ विशेष नहीं लिखा गया।

अलंकार सम्प्रदाय

अलंकार सम्प्रदाय के अनुयायियों में केशव के उपरान्त कालक्रम की दृष्टि से जसवन्त सिंह का नाम आता है। इनका सबसे अधिक प्रसिद्ध रीतिग्रन्थ ‘भाषाभूषण’ रहा है। मतिराम (1617 ई.) की प्रवृत्ति रस की ओर अधिक है और लक्षणकार की अपेक्षा वे कवि अधिक हैं, फिर भी उनके ‘अलंकारपंचाशिका’ (1690 ई.) और ‘ललितललाम’ ग्रन्थ अलंकार पर हैं। भूषण (1613 से 1715 ई.) मतिराम के भाई थे। इन्हें आलंकारिक भी कहना चाहिए। तथापि इनकी उक्तियाँ वीर रस से पूर्ण हैं, फिर भी इनके प्रधान ग्रन्थ ‘शिवराजभूषण’ (1653 ई.) में अलंकार के ही लक्षण उदाहरण हैं। भूषण महाराज शिवाजी के मित्र तथा उनके दरबारी कवि थे। इस सम्प्रदाय के अन्य प्रमुख कवियों में गोप, रसिक, सुमति, गोविन्द, दूलह (रचनाकाल 1750 से 1755 ई.), बैरीसाल, गोकुलनाथ तथा पद्माकर हैं। पद्माकर (1753 से 1832 ई.) को रीतिकाल का अन्तिम आलंकारिक कवि कहना चाहिए। कवि और रीति ग्रन्थकार, दोनों के ही रूप में पद्माकर का नाम अत्यन्त प्रसिद्ध हुआ।

रस सम्प्रदाय

रस सम्प्रदाय के अन्तर्गत तोष तथा मतिराम की ख्याति विशेष है। तोष कवि का 1637 ई. का लिखा हुआ ग्रन्थ ‘सुधानिधि’ है। इसकी सरसता उदाहरणों में है। लक्षणों में कोई विवेचन सम्बन्धी नवीनता नहीं है। इसी प्रकार का ग्रन्थ मतिराम (1617 ई.) का ‘रसराज’ है। इसमें शृंगार का नायक-नायिका भेदरूप में वर्णन है। मतिराम के लक्षण महत्त्वपूर्ण नहीं हैं, उदाहरण अवश्य बड़े ही सरस, कोमल तथा कल्पनायुक्त हैं। रस के क्षेत्र में सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य आचार्य देव (1673-1768) का है। देव ने रस पर अनेक ग्रन्थ लिखे हैं, जिनमें अधिकतर शृंगार और नायिकाभेद की ही चर्चा है और एक ही प्रकार के भाव अन्य ग्रन्थों में भी आये हैं। रस सम्बन्धी भावना प्रमुखत: ‘भावविलास’, ‘भवानीविलास’ और ‘काव्यरसायन’ में प्रकट हुई है। देव ने रस के दो भेद माने हैं-लौकिक और आलौकिक। देव के पश्चात् कालिदास, कृष्णभट्ट, कुमारमणि, श्रीपति, सोमनाथ, उदयनाभ, ‘कवीन्द्र’ दास आदि अनेक आचार्यों ने नायिकाभेद और रस पर लिखा है। परन्तु रस के सम्बन्ध में कोई महत्त्वपूर्ण विचार प्रकट नहीं हुए हैं। इस सम्प्रदाय के अन्य कवियों में रसलीन (अंगदर्पण, रसप्रबोध), दास, रूपसाहि, समनेस, उजियारे, यशवंत सिंह, रामसिंह (‘रामनिवास’, 1782 ई.) पद्माकर, रसिक, गोविन्द, बेनी प्रवीन तथा काव्य-सौन्दर्य, दोनों ही दृष्टियों से रामसिंह तथा ग्वाल का कार्य महत्त्वपूर्ण है।

ध्वनि के आचार्य
हिन्दी रीतिशास्त्र के अन्तर्गत ध्वनि के सर्वप्रथम आचार्य कुलपति मिश्र हैं। कूर्मवंशी जयसिंह के लिए इन्होंने ‘रसरहस्य’ की रचना की। ‘रसरहस्य’ का रचनाकाल 1670 ई. है। कुलपति के विचार प्रौढ़ और प्रामाणिक हैं, पर कोई नवीन विचार देखने को नहीं मिलते। कुलपति के बाद देव ने ध्वनि पर लिखा है। इस काल के अन्य कवियों में सूरति मिश्र, कुमारमणि भट्ट, श्रीपति, सोमनाथ, भिखारीदास, प्रतापसाहि तथा रामदास के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। रीतिकाल के आचार्य कवियों में भिखारीदास (रचनाकाल 1728-1750 ई.) का नाम प्रथमपंक्तिय है। दास ने ‘रससारांश’, ‘छन्दोर्णवपिंगल’, ‘काव्यनिर्णय’ और ‘शृंगारनिर्णय’ ग्रन्थ काव्यशास्त्र पर लिखे। काव्यशास्त्र की दृष्टि से सबसे प्रौढ़ और प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘काव्यनिर्णय’ है, जिसमें ध्वनि का विवेचन और रस, अलंकार, गुण, दोष आदि का वर्णन है। हिन्दी रीतिकाव्य (लक्षणरहित काव्य) की परम्परा भक्तिकाल ही प्रारम्भ हो जाती है। कृपाराम, ब्रह्म (बीरबल), गंग, बलभद्र मिश्र, केशवदास, रहीम तथा मुबारक कालक्रम की दृष्टि से यद्यपि भक्तिकाल के अन्तर्गत आते हैं, परन्तु उनकी काव्यपद्धति प्राय: रीतिप्रधान ही थी। उनके कृतित्व में प्रमुख ध्यान काव्य रचना का है और कोई यदि है तो गौण। रीतिकाव्य की प्रेरणा मुख्यत: आचार्य केशवदास और अकबर के दरबारी कवियों से ही प्राप्त हुई थी। इस परम्परा के साथ काव्य की एक स्वच्छन्द धारा का विकास हुआ, जिसके प्रवाह ने रीतिकाल में समस्त काव्य रसिकों को ओत-प्रोत कर दिया।

अन्य कवि
इस युग के रीति-कवियों में सबसे प्रथम सेनापति (1589 ई.) का नाम आता है। इनका प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘कवित्तरत्नाकर’ है। सेनापति की विशेष प्रसिद्धि उनके प्रकृति चित्रण तथा श्लेषचमत्कार के कारण है। ‘कवित्तरत्नाकर’ की रचना सन 1649 ई. में हुई। रीतिकाव्य की इस प्रथम महत्त्वपूर्ण रचना ने हिन्दी रीतिकाव्य को अतिशय प्रेरणा प्रदान की, इसमें सन्देह नहीं। बिहारीलाल (1603-1662 ई.) रीतिकाव्य के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं और उनकी यह ख्याति उनके अन्यतम ग्रन्थ ‘सतसई’ पर आधारित है, जिसे उन्होंने जयपुर के महाराज जयशाह के आदेश पर लिखा था। मुक्तक रचना होते हुए भी सतसई में सतसई का ध्यान अलंकार, रस, भाव, नायिका-भेद, ध्वनि, वक्रोक्ति, रीति, गुण आदि सब पर है और सभी के सुन्दर उदाहरण इसमें हैं।

रीति-परम्परा का पालन करते हुए और भाई होते हुए भी भूषण (1613-1715) की प्रकृति मतिराम के बिल्कुल विपरीत है। भूषण का काव्य ओजपूर्ण और वीर रस से ओत-प्रोत है। अत: रीतिकाव्य की शृंगारिक परम्परा का अनुगमन न करके ये वीर-परम्परा का मार्ग प्रशस्त करने वाले हैं। वीर रस पर लिखने वाले तो रीतिकाल में और भी कवि हैं, पर रीति परम्परा पर वीर काव्य लिखने वाले भूषण अकेले हैं। शिवाजी की वीरता तथा अन्य गुणों से प्रेरित भूषण का ‘शिवराजभूषण’ अलंकारिक सौन्दर्य से भरपूर है। ललित शब्दावली में कोमल भावनाओं को व्यक्त करने वाले सुकुमार कल्पना के कवि मतिराम (1617 ई.) का काव्य रीतिकाव्य का प्रतिनिधित्व करता है। उनके ग्रन्थ ‘ललितललाम’, ‘रसराज’, ‘अलंकारपंचाशिका’ आदि में यद्यपि लक्षण दिये हुए हैं, फिर भी प्रधानता उदाहरण काव्य की है। अत: उनकी गणना रीतिशास्त्रियों में अधिक रीति-कवियों में होती है।

घनानन्द (रचनाकाल 1658 ई.) प्रसिद्ध प्रेमी, भक्त और कवि थे। उनका ध्यान अलंकार, रीति, वक्रोक्ति, नायिका-भेद, रस आदि की ओर नहीं है, फिर भी इनकी रचना में आलंकारिक चमत्कार तथा शृंगार के संयोग और वियोग, दोनों ही पक्षों का इतना दक्षतापूर्ण वर्णन है कि रीति-परम्परा का प्रयास उससे स्पष्ट लक्षित होता है। घनानन्द का ‘सुजानसागर’ रीतिकाव्य के प्रसिद्ध ग्रन्थों में एक है। देव (1673 ई.) को आचार्य और कवि, दोनों ही रूपों में सफलता प्राप्त हुई है। उनके कृतित्व में मौलिकता तथा कवित्वशक्ति का विलक्षण संयोग हुआ है। भाव की पकड़, सूक्ष्म निरीक्षण, भाषा पर अधिकार, छन्द की गति, शब्दवर्णमैत्री, सरसता और उक्तिवैचित्र्य, सब मिलकर देव की रचना को स्मरणीय बनाते हैं। मानव स्वभाव का उन्हें बड़ा सूक्ष्म ज्ञान था। अपने ग्रन्थ ‘भावविलास’ की रचना देव ने 16 वर्ष की अवस्था में की थी।

भिखारीदास (रचनाकाल 1728-1750 ई.) आचार्य और कवि, दोनों ही रूपों में उत्कृष्ट हैं। जहाँ अपने ग्रन्थों में इन्होंने ध्वनि, अलंकार, रस, नायिका-भेद, छन्द आदि के लक्षण और विवेचन प्रस्तुत किये हैं, वहाँ उनके उदाहरणों द्वारा प्रस्तुत कविता रीतिकाव्य का सुन्दर नमूना है। भिखारीदास के समकालीन रसलीन (सैयद ग़ुलाम नबी बिलग्रामी) का काव्य बड़ा ही चुटीला है और उक्तिचमत्कार के कारण इनके दोहे अत्यन्त प्रसिद्ध हैं। इनके लिखे दो ग्रन्थ मिले हैं-‘अंगदर्पण’ और ‘रसप्रबोध’। बेनी प्रबीन (1753-1833 ई.) रीतिकाव्य के अन्तिम प्रतिभासम्पन्न कवि हैं। इनके ग्रन्थ ‘जगद्विनोद’ तथा फुटकर छन्दों में रीतिकाव्य की प्रवृत्तियों का सुन्दर परिचय मिलता है। पद्माकर में भावविवृति की विलक्षण शक्ति है। ग्वाल (रचनाकाल 1822-1861 ई.) भी पद्माकर की परिपाटी पर हैं। इनकी भाषा अधिक प्रांजल न होकर बाज़ारूपन लिये है। फिर भी इनके वर्णन सुन्दर हैं।

रीतिकालीन काव्य की भाषा
रीतिकालीन काव्य प्राय: ब्रजभाषा तथा उसके स्थानीय रूपों में लिखा गया। अधिकांश काव्य राजाश्रय में लिखा गया था। अधिक प्रवृत्ति अलंकृत काव्य लिखने की रही है। शृंगार के अन्तर्गत काम-वासना और नारी-सौन्दर्य का चित्रण हुआ है, कहीं-कहीं भक्ति-भावना भी दिखाई दे जाती है। कुछ रचनाओं में वीर-भावना, नीति-उपदेश, लोक ज्ञान, व्यवहार आदि से सम्बन्धित सामग्री मिलती है। इस युग के कवियों का जीवन के प्रति दृष्टिकोण आध्यात्मिक न होकर ऐहिक अधिक है।