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Pin Drop

Can you hear a pin drop?
What is the meaning of pin drop silence?
Following are some instances when silence could speak louder than voice. 
Take 1:
Robert Whiting, 

an elderly US gentleman of 83, arrived in Paris by plane. 
At French Customs, he took a few minutes to locate his passport in his carry on.
“You have been to France before, Monsieur ?”, the Customs officer asked sarcastically.
Mr. Whiting admitted that he had been to France previously.
“Then you should know enough to have your passport ready.” 
The American said, 

“The last time I was here, 

I didn’t have to show it.”
“Impossible.  

Americans always have to show their passports on arrival in France !”, the Customs officer sneered.
The American senior gave the Frenchman a long, hard look. 
Then he quietly explained 
“Well, when I came ashore at Omaha Beach, 

at 4:40am, on D-Day in 1944, to help liberate your country, I couldn’t find a single Frenchman to show a passport to…. ” 
You could have heard a pin drop

Take 2:
Soon after getting freedom from British rule in 1947, the de-facto prime minister of India, Jawahar Lal Nehru called a meeting of senior Army Officers to select the first General of the Indian army.
Nehru proposed, “I think we should appoint a British officer as a General of The Indian Army, as we don’t have enough experience to lead the same.”

Having learned under the British, only to serve and rarely to lead, all the civilians and men in uniform present nodded their heads in agreement.
However one senior officer, Nathu Singh Rathore, asked for permission to speak.
Nehru was a bit taken aback by the independent streak of the officer, though, he asked him to speak freely.
Rathore said, “You see, sir, we don’t have enough experience to lead a nation too, so shouldn’t we appoint a British person as the first Prime Minister of India?”
You could hear a pin drop.

After a pregnant pause, Nehru asked Rathore,

“Are you ready to be the first General of The Indian Army?”..
Rathore declined the offer saying “Sir, we have a very talented army officer, my senior, Gen. Cariappa, who is the most deserving among us.”
This is how the brilliant Gen. Cariappa became the first General and Rathore the first ever Lt. General of the Indian Army.
(Many thanks to Lt. Gen Niranjan Malik PVSM (Retd) for this article.)

Worth reading?!

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व्यंग्य – देवलोक में डी ग्रेड 

सब आदमियों के पाप-पुण्य कर्मो का हिसाब लिखकर चित्रगुप्त ऑफिस का काम निपटा के मजे से घर पर सोया था कि उसके पास whatsapp पर सूचना आयी । 

इंद्रसभा के बजटसत्र में किसी देवता ने कोई प्रश्न पूछ लिया था और उसका जवाब तैयार करना था । आनन फानन में यमराज ने बुलवा लिया । यमराज खुद भी सकपकाये हुए थे, बोले,” यार चित्रगुप्त, नौकरी करना आजकल कठिन हो गया । ये whatsapp भी जी का जंजाल है, ये देवता लोगों को और कोई तो काम है, कोई न कोई आदेश भेजते रहते है और चैन नही लेने देते ।”

चित्रगुप्त बोले- सही कहा सर, पहले सरल था, मेरे पास एक पोथा था उसमें सब कुछ लिख लेता था, अब तो शिक्षा विभाग की तरह कभी वैकुण्ड लोक से कोई सूचना मांगी जाती है, कभी शिवलोक वाले कोई आंकड़ा पूछ लेते है, परेशान करके रख दिया है । जो आत्माएं यमलोक में आ रही है उसमें से sc कितने, st कितने, gen कितने, obc कितने, पुरुष कितने, महिलाये कितनी, यानी b, g, t छांटो । फिर age के हिसाब से छांटो । नारद ऋषि ने कहा है कि सारी आत्माओं का डाटा यमदर्शन और यमदर्पण पर upload और करवाओ…मन तो करता है रिजाइन कर दूँ ।” 

यमराज भी भावुक हो उठे, बोले- चित्रगुप्त नौकरी तो मैं भी छोड़ दूँ पर फिर मुझे मेरे बच्चों का ख्याल आता है, क्या खायेंगे, बेरोजगारी ज्यादा है, प्राइवेट नौकरी में कुछ रखा नही वरना राहुकेतु एंड कंपनी तो मुझे नियुक्ति देने को तैयार है, खैर छोड़ो, वो यमलोक के फोटो खींचकर साइट पर डलवा देना नही तो ब्रह्मलोक से स्पष्टीकरण आएगा । और बताओ पृथ्वी लोक के क्या हाल है?

चित्रगुप्त अब थोड़े मुस्कुराए, बोले- सर जो आत्माएं ताजा ताजा पृथ्वी से आ रही है वो अपडेट दे रही है कि पृथ्वी पर योगियों का राज हो गया है । नोटबन्दी के बाद काला धन तो खत्म हो ही गया था already, इसलिये सब कुशल मंगल है पृथ्वीलोक पर लेकिन स्वर्ग लोक में हड़कम्प मचा हुआ है ।

यमराज थोड़े टेंशन में आये- क्यों चित्रगुप्त? ऐसा क्या हुआ?

चित्रगुप्त ने यमलोक का पंखा थोड़ा तेज किया और बोले- “सर आपको तो पता ही है, स्वर्ग लोक में ग्रेडिंग सिस्टम लग गया है।

शिवपुत्र बाल गणेशा कि तो A ग्रेड आयी है लेकिन इंद्र के पुत्र जयंत और चंद्रदेव के पुत्र बुध, सूर्यपुत्र शनि आदि सभी बालकों की D ग्रेड आयी है । result खराब होने के कारण गुरु बृहस्पति के नाम नोटिस निकला है ।”

यमराज बोले – इस समस्या का क्या हल है चित्रगुप्त? 

चित्रगुप्त बोले-धर्मराज सर, रिटायरमेंट से पहले ही पृथ्वीलोक पर अभी 2 मास्टरों का देहांत हुआ है । उनकी आत्माओं को बुलाया है, दोनों हेडमास्टर थे लेकिन रिसल्ट 100% दिया हमेशा, मैंने दोनों को स्वर्ग के सरकारी स्कूल में कुछ दिन डेपुटेशन लगवाया था, अभी दोनों आते होंगे । 

The Academic Partner Bali
तभी पायजामा कुर्ते और गमछे चश्मे में दुबले पतले दो लोग आ पहुँचे । उनकी पूरी जिंदगी डाके बनाने में गुजरी थी, कार्बन कॉपी में हेडमास्टर की सील लगाकर तथ्यात्मक रिपोर्ट बनाकर लाये थे । 

उनमे से एक हेडमास्टर बोला- यहाँ भी वहीँ हाल है जो पृथ्वी लोक पर है । साल के बारह महीने दिन के चौबीस घण्टे पढाई से अलग वाले ही काम है, । यहाँ अग्नि देव पोषाहार प्रभारी है क्योंकि खाना उन्ही पर बनता है । वरुण देव स्वच्छता प्रभारी है, पानी की जरूरत पड़ती है, बृहस्पति जी हेडमास्टर की तरह डाके बनाने में बिजी रहते है, वायुदेव बीएलओ की तरह पूरे सातों लोकों में घुमते रहते है, कुबेर के पास कैशबुक का चार्ज है और वो लेनदेन में बिजी रहते है और बैंक के चक्कर काटते डोलते है । देवी सरस्वती पुस्तकालय प्रभारी है । चंद्रदेव मेहनती अध्यापक है लेकिन उनको प्रशिक्षणों में बुलवा लेते है तो वो महीने में 15 दिन दिखते नही…..”

यमराज और चित्रगुप्त दोनों एक साथ बोले- लेकिन पृथ्वी लोक पर तो तुम दोनों की तो हमेशा c ग्रेड आयी है । इतने कामों के बावजूद तो यहाँ भी वहीँ आईडिया बताओ न …

एक हेडमास्टर बोले- ,”अब यहाँ भी किसी की डी ग्रेड नही आएगी, हमने एक whatsapp ग्रुप बनाया है जिसका नाम है, “नोडल केंद्र देवलोक” उसमें सारे देव टीचर add कर लिए है और मैसेज वायरल कर दिया है कि तुम लोगों को पढ़ाने को तो मिलना नही । स्पष्टीकरण/नोटिस से बचना है तो ठीक ठीक नम्बर देना अपने अपने विषय में । ”

(अबकी बार किसी की डी नही आयी और ब्रह्मा विष्णु महेश भी सोच में पड़ गए है )

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Busy but Be Easy Too

एक गिलहरी रोज अपने काम पर समय से आती थी और अपना काम पूरी मेहनत और ईमानदारी से करती थी !

गिलहरी जरुरत से ज्यादा काम कर के भी खूब खुश थी क्योंकि उसके मालिक, जंगल के राजा शेर ने उसे दस बोरी अखरोट देने का वादा कर रखा था।

गिलहरी काम करते करते थक जाती थी तो सोचती थी कि थोडी आराम कर लूँ
वैसे ही उसे याद आता,
कि शेर उसे दस बोरी अखरोट देगा –
गिलहरी फिर काम पर लग जाती !

गिलहरी जब दूसरे गिलहरीयों को खेलते देखती थी तो उसकी भी इच्छा होती थी कि मैं भी खेलूं पर उसे अखरोट याद आ जाता,
और वो फिर काम पर लग जाती !

ऐसा नहीं कि शेर उसे अखरोट नहीं देना चाहता था, शेर बहुत ईमानदार था !

ऐसे ही समय बीतता रहा….

एक दिन ऐसा भी आया जब जंगल के राजा शेर ने गिलहरी को दस बोरी अखरोट दे कर आज़ाद कर दिया !

गिलहरी अखरोट के पास बैठ कर सोचने लगी कि अब अखरोट मेरे किस काम के ?
पूरी जिन्दगी काम करते – करते दाँत तो घिस गये, इन्हें खाऊँगी कैसे !

यह कहानी आज जीवन की हकीकत बन चुकी है !

इन्सान अपनी इच्छाओं का त्याग करता है, पूरी ज़िन्दगी नौकरी, व्योपार, और धन कमाने में बिता देता है !
६० वर्ष की ऊम्र में जब वो सेवा निवृत्त होता है, तो उसे उसका जो फन्ड मिलता है, या बैंक बैलेंस होता है, तो उसे भोगने की क्षमता खो चुका होता है, तब तक जनरेशन बदल चुकी होती है, परिवार को चलाने वाले बच्चे आ जाते है।

क्या इन बच्चों को इस बात का अन्दाजा लग पायेगा की इस फन्ड, इस बैंक बैलेंस के लिये : –

कितनी इच्छायें मरी होंगी ?
कितनी तकलीफें मिली होंगी ?
कितनें सपनें अधूरे रहे होंगे ?

क्या फायदा ऐसे फन्ड का, बैंक बैलेंस का, जिसे पाने के लिये पूरी ज़िन्दगी लग जाये और मानव उसका भोग खुद न कर सके !

इस धरती पर कोई ऐसा अमीर अभी तक पैदा नहीं हुआ जो बीते हुए समय को खरीद सके।

इसलिए हर पल को खुश होकर जियो व्यस्त रहो, पर साथ में मस्त रहो सदा स्वस्थ रहो।

BUSY पर BE-EASY भी रहो ।

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Vanilla Ice Cream that puzzled General motors!!!!

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An Interesting Story

Never underestimate your Customers’ Complaint, no matter how funny it might seem!

This is a real story that happened between the customer of General Motors and its Customer-Care Executive. Pls read on…..

A complaint was received by the Pontiac Division of General Motors:

‘This is the second time I have written to you, and I don’t blame you for not answering me, because I sounded crazy, but it is a fact that we have a tradition in our family of Ice-Cream for dessert after dinner each night, but the kind of ice cream varies so, every night, after we’ve eaten, the whole family votes on which kind of ice cream we should have and I drive down to the store to get it. It’s also a fact that I recently purchased a new Pontiac and since then my trips to the store have created a problem…..

You see, every time I buy a vanilla ice-cream, when I start back from the store my car won’t start. If I get any other kind of ice cream, the car starts just fine. I want you to know I’m serious about this question, no matter how silly it sounds “What is there about a Pontiac that makes it not start when I get vanilla ice cream, and easy to start whenever I get any other kind?” The Pontiac President was understandably skeptical about the letter, but sent an Engineer to check it out anyway.

The latter was surprised to be greeted by a successful, obviously well educated man in a fine neighborhood. He had arranged to meet the man just after dinner time, so the two hopped into the car and drove to the ice cream store. It was vanilla ice cream that night and, sure enough, after they came back to the car, it wouldn’t start.

The Engineer returned for three more nights. The first night, they got chocolate. The car started. The second night, he got strawberry. The car started. The third night he ordered vanilla. The car failed to start.

Now the engineer, being a logical man, refused to believe that this man’s car was allergic to vanilla ice cream. He arranged, therefore, to continue his visits for as long as it took to solve the problem. And toward this end he began to take notes: He jotted down all sorts of data: time of day, type of gas uses, time to drive back and forth etc.

In a short time, he had a clue: the man took less time to buy vanilla than any other flavor. Why? The answer was in the layout of the store. Vanilla, being the most popular flavor, was in a separate case at the front of the store for quick pickup. All the other flavors were kept in the back of the store at a different counter where it took considerably longer to check out the flavor.

Now, the question for the Engineer was why the car wouldn’t start when it took less time. Eureka – Time was now the problem – not the vanilla ice cream!!!! The engineer quickly came up with the answer: “vapor lock”.

It was happening every night; but the extra time taken to get the other flavors allowed the engine to cool down sufficiently to start. When the man got vanilla, the engine was still too hot for the vapor lock to dissipate.

Even crazy looking problems are sometimes real and all problems seem to be simple only when we find the solution, with cool thinking.
What really matters is your attitude and your perception.

“Success is not a Long jump nor a High jump, its a Marathon of Steps”

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बिल : एक कहानी

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सच्ची घटना …!!
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रात का वक्त था, होटल के टेबल पर बैठा एक समान्य वयस्क मजदूर अपना खाना खा रहा था ..! तभी उसकी नजर होटल के बाहर कडी ठण्ड में खडे छोटे से भाई बहन की जोडी पर गई …!!
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उन दोनों बच्चों की दुखी नजर उस आदमी के टेबल पर रखी खाने की थाली पर थी, यह बात उस आदमी के ध्यान में सेकंड में आ गयी …!!
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नजरों से इशारा करते दोनों बच्चों को अंदर बुलाया बच्चे डरते डरते ही अंदर आये,
उस आदमी ने दोनों बच्चों के लिए खाने की दो थाली मंगाई …..
नन्हे बच्चें अपने नन्हे से हाथों में जो बैठ रहा था वो फटाफट खा रहे थे ……
नन्हे बच्चों के पेट में भूख की आग बुझ रही थी …
खाना खाने के बाद उस आदमी ने बिल मंगवाया …..!!
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काउंटर पर से बिल आया, आँकड़ा देखकर वो आदमी स्तब्ध निशब्द रह गया ..!!
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पता है, बिल कितना था ?
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उस बिल पर लिखा था “हमारे पास ऐसी कोई मशीन या आँकडा नहीं जिससे मानवता की कीमत लगाई जा सके, भगवान आपका भला करे ”

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रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद के बीच एक दुर्लभ संवाद

स्वामी विवेकानंद     :  मैं समय नहीं निकाल पाता. जीवन आप-धापी से भर गया है.

रामकृष्ण परमहंस   :  गतिविधियां तुम्हें घेरे रखती हैं. लेकिन उत्पादकता आजाद करती है.

स्वामी विवेकानंद     :  आज जीवन इतना जटिल क्यों हो गया है?   
     
रामकृष्ण परमहंस   :  जीवन का विश्लेषण करना बंद कर दो. यह इसे जटिल बना देता है. जीवन को सिर्फ जिओ.

स्वामी विवेकानंद     :  फिर हम हमेशा दुखी क्यों रहते हैं?   
   
रामकृष्ण परमहंस   :  परेशान होना तुम्हारी आदत बन गयी है. इसी वजह से तुम खुश नहीं रह पाते.

स्वामी विवेकानंद     :  अच्छे लोग हमेशा दुःख क्यों पाते हैं?

रामकृष्ण परमहंस   :  हीरा रगड़े जाने पर ही चमकता है. सोने को शुद्ध होने के लिए आग में तपना पड़ता है. अच्छे लोग दुःख नहीं पाते बल्कि परीक्षाओं से गुजरते हैं. इस अनुभव से उनका जीवन बेहतर होता है, बेकार नहीं होता.

स्वामी विवेकानंद     :  आपका मतलब है कि ऐसा अनुभव उपयोगी होता है?

रामकृष्ण परमहंस   :  हां. हर लिहाज से अनुभव एक कठोर शिक्षक की तरह है. पहले वह परीक्षा लेता है और फिर सीख देता है.

स्वामी विवेकानंद     :  समस्याओं से घिरे रहने के कारण, हम जान ही नहीं पाते कि किधर जा रहे हैं…

रामकृष्ण परमहंस   :  अगर तुम अपने बाहर झांकोगे तो जान नहीं पाओगे कि कहां जा रहे हो. अपने भीतर झांको. आखें दृष्टि देती हैं. हृदय राह दिखाता है.

स्वामी विवेकानंद     :  क्या असफलता सही राह पर चलने से ज्यादा कष्टकारी है?

रामकृष्ण परमहंस   :  सफलता वह पैमाना है जो दूसरे लोग तय करते हैं. संतुष्टि का पैमाना तुम खुद तय करते हो.

स्वामी विवेकानंद     :  कठिन समय में कोई अपना उत्साह कैसे बनाए रख सकता है?

रामकृष्ण परमहंस   :  हमेशा इस बात पर ध्यान दो कि तुम अब तक कितना चल पाए, बजाय इसके कि अभी और कितना चलना बाकी है. जो कुछ पाया है, हमेशा उसे गिनो; जो हासिल न हो सका उसे नहीं.

स्वामी विवेकानंद     :  लोगों की कौन सी बात आपको हैरान करती है?

रामकृष्ण परमहंस   :  जब भी वे कष्ट में होते हैं तो पूछते हैं, “मैं ही क्यों?” जब वे खुशियों में डूबे रहते हैं तो कभी नहीं सोचते, “मैं ही क्यों?”

स्वामी विवेकानंद     :  मैं अपने जीवन से सर्वोत्तम कैसे हासिल कर सकता हूँ?

रामकृष्ण परमहंस   :  बिना किसी अफ़सोस के अपने अतीत का सामना करो. पूरे आत्मविश्वास के साथ अपने वर्तमान को संभालो. निडर होकर अपने भविष्य की तैयारी करो.

स्वामी विवेकानंद     :  एक आखिरी सवाल. कभी-कभी मुझे  लगता है कि मेरी प्रार्थनाएं बेकार जा रही हैं.

रामकृष्ण परमहंस   :  कोई भी प्रार्थना बेकार नहीं जाती. अपनी आस्था बनाए रखो और डर को परे रखो. जीवन एक रहस्य है जिसे तुम्हें खोजना है. यह कोई समस्या नहीं जिसे तुम्हें सुलझाना है. मेरा विश्वास करो- अगर तुम यह जान जाओ कि जीना कैसे है तो जीवन सचमुच बेहद आश्चर्यजनक हैl

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He Can’t Do It

Once upon a time, two young boys were playing on thin ice. As they were playing, one of them fell through that ice into the lake underneath. The other one tried hard and he couldn’t reach his friend through that gap.

So he walked up to a tree, pulled and broke a branch of enormous size. He came back and started beating the ice and he saved his friend.

When the paramedics came and they were able to revive the kid, they were baffled and they couldn’t understand that how did his friend break an enormous sized branch and then beat the ice and save his friend. They thought it was IMPOSSIBLE

Then the old man who was standing there said, “I can tell you how he did it.”

They said, “How? How he did it.”

The old man said, “There was no one here to tell him that he can’t do it.”.

Courtesy : Shaily Jain

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A Peacock & A Crane

One day a peacock met a crane and said, “So sorry for you. You have so dull feathers. Look at the fine colours of my feathers.”

“Well!’ replied the crane, “your look are brighter then mine, but whereas I can fly high up into the sky. All you can do is to strut about on the ground.”

Moral: Never Find Fault With Others

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